Apni alag pahchan bana – अपनी अलग पहचान बना

अपनी अलग पहचान बना…

लिख रही है नियति गाथा, 
कदमों के कुछ निशान बना।
रख खुद पे भरोसा तू,
कुल , ऊंची शान बना।
बदल दे अपनी दुनिया,
नई धरती, नया आसमान बना,
अपनी अलग पहचान बना।
अपनी अलग पहचान बना।
राह जो जग ने दिखाई
तो चलने का क्या मतलब है?
गैरों के शर्तों पर जियें,
क्या जीवन का ये मकसद है?
बल, बुद्धि और विवेक से
भीड़ जा एक, दो या हरेक से
पर नई राह, नया मुकाम बना।
अपनी अलग पहचान बना।
अपनी अलग पहचान बना।
अपने भविष्य के निर्माता तुम हो,
अपने अस्तित्व के विधाता तुम हो।
खुद के निर्माण में तुम पसीने बहाओ,
खुद के निर्माण में सुख-चैन गवाओ।
खुद के निर्माण में दिन-रात भुलाओ।
या खुद की बाधाओं को धूल चटाने,
खुद को अब तू चट्टान बना।
अपनी अलग पहचान बना।
अपनी अलग पहचान बना।
इतिहास की पुस्तक में,
कुछ पन्ने तुम्हारे हो।
वीरों के आभूषणों में
कुछ गहने तुम्हारे हो।
जो जयघोष हो सभाओं में
तो नाम तुम्हारा पुकारा जाए।
जो उद्घोष हो उपलब्धि की
तो काम तुम्हारा सराहा जाए।
तू हस्ती ऐसी कीर्तिमान बना,
अपनी अलग पहचान बना।
अपनी अलग पहचान बना।
फिर नियति तुम्हारी कथा लिखेगी,
फिर नियति तुम्हारी गाथा लिखेगी।
तुम्हारी रण की नई गीता लिखेगी,
तुम्हें नये निर्माण का पिता लिखेगी।
तुम्हारा कोई पर्याय नहीं,
तुम्हारा कोई उपाय नहीं।
रोक सके जो राह तुम्हारा
ऐसा कोई निकाय नहीं।
कर दे सर वंश का ऊंचा,
ऐसा अडिग स्वाभिमान बना।
अपनी अलग पहचान बना।
अपनी अलग पहचान बना।
- प्रेम कुमार
लिख रही है नियति गाथा,
कदमों के कुछ निशान बना।
रख खुद पे भरोसा तू,
कुल उच्चा, ऊंची शान बना।
बदल दे अपनी दुनिया,
नई धरती, नया आसमान बना,
अपनी अलग पहचान बना।
अपनी अलग पहचान बना।

ये motivational hindi poetry हमें समय के साथ अपनी अलग पहचान बनाने के लिए प्रेरित करती है। वक़्त अपनी रफ्तार से चलते हुए, प्रति क्षण इतिहास लिख रहा है। इसके पन्नों में उन्हीं का नाम सबसे उपर रहता है जो अपने कदमों के निशान छोड़ जाते हैं अर्थात् अपनी कृति से इस संसार को कुछ समर्पित कर के जाते हैं। उनकी कृति से उनके वंश का, उनके कुल का भी नाम रौशन होता है।

किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी भी क्षेत्र में समाज के लिए किया गया योगदान हमेशा लोगों के विश्वास को नया आयाम देती है। पुराने भ्रंतियों को तोड़कर नयी उच्चतम और निम्नतम मर्यादा का निर्माण करती है। या फिर यूँ कहे कि हमें उन्मुक्त बनाती है।

राह जो जग ने दिखाई
तो चलने का क्या मतलब है?
गैरों के शर्तों पर जियें,
क्या जीवन का ये मकसद है?
बल, बुद्धि और विवेक से
भीड़ जा एक, दो या हरेक से
पर नई राह, नया मुकाम बना।
अपनी अलग पहचान बना।
अपनी अलग पहचान बना।

hindi poetry apni alag pahchan bana के इस अंश में कहा गया है कि हम में से लगभग सभी लोग उसी पथ पर चलना चाहते हैं जो किसी ना किसी ने दिखाई है या किसी ने तैयार की है क्योंकि इसमें चलना आसान होता है और कष्टदायक नहीं होता लेकिन ऐसे पथ पर चलने का क्या मतलब जिसमें रास्ते की बाधाओं को हटाने में हमारा कोई योगदान ही ना हो।

जिस रास्ते पर हजारों में लोग आ जा चुके हैं उस रास्ते में हमारे पदचिन्ह बन ही नहीं सकते और रास्ता पुर्व निर्धारित होने के कारण हमें उन्हीं शर्तों और मर्यादाओं का पालन करना पड़ता है जो पहले से बनी हैं। हमारा कर्तव्य होना चाहिए कि हम अपने बल, बुद्धि और विवेक का प्रयोग कर पुरानी रितियों व पुरानी सोच के विरुद्ध लड़े और नई राह, नई मुकाम का निर्माण करें।

अपने भविष्य के निर्माता तुम हो,
अपने अस्तित्व के विधाता तुम हो।
खुद के निर्माण में तुम पसीने बहाओ,
खुद के निर्माण में सुख-चैन गवाओ।
खुद के निर्माण में दिन-रात भुलाओ।
या खुद की बाधाओं को धूल चटाने,
खुद को अब तू चट्टान बना।
अपनी अलग पहचान बना।
अपनी अलग पहचान बना।

मिसाइल मैन डॉ एपीजे अब्दुल कलाम कहते हैं, “कितने ही फुल आकर गुलशन में जा फिजा बिखरा गए हसरत तो उन कलियों से थी जो बिन खिले मुरझा गए।” बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो उद्देश्य विहीन जीवन जीते हैं जिसके कारण उनका अस्तित्व और भविष्य भी उद्देश्य विहीन हो जाता है। 

इस poetry in hindi apni alag pahchan bana के इस काव्यांश में वर्णन है कि हम अपने भविष्य के  निर्माता खुद ही हैं, अपने लगन, मेहनत और विवेक के बल पर हम अपने भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। अपने समय का उपयोग अपने अस्तित्व को साबित करने में लगाएं तो हम अपने अस्तित्व के विधाता भी बन सकते हैं। 

महान अर्थशास्त्री चाणक्य कहते हैं, “मेहनत करने से दरिद्रता नहीं रहती है, ज्ञान अर्जित करने से दुख नहीं रहता है” अपने भविष्य के निर्माण के लिए हमें भरपूर मेहनत करनी पड़े, अपना सुख चैन गवा ना पड़े या रात दिन एक करना पड़े। फिर भी किसी भी हाल में हमें रुकना नहीं चाहिए। अपने आत्मविश्वास को चट्टान की भांति इतना मजबूत बना लेना है की हमारी बाधाएं भी धूल के समान नजर  आए।

इतिहास की पुस्तक में,
कुछ पन्ने तुम्हारे हो।
वीरों के आभूषणों में
कुछ गहने तुम्हारे हो।
जो जयघोष हो सभाओं में
तो नाम तुम्हारा पुकारा जाए।
जो उद्घोष हो उपलब्धि की
तो काम तुम्हारा सराहा जाए।
तू हस्ती ऐसी कीर्तिमान बना,
अपनी अलग पहचान बना।
अपनी अलग पहचान बना।

Apni alag pahchan bana: hindi poetry के इस काव्यांश में कहा गया है कि किसी रास्ते पर चले और हमारे पैरों  के निशान ही ना बने तो चलने का क्या फायदा अर्थात अगर जिंदगी हम जी रहे हैं तो कुछ ऐसे जीयें कि इतिहास हमें अपने पन्नों में स्थान दें। इतिहास हमें अपने पन्नों पर सुनहरे अक्षरों से हमारा नाम तभी अंकित करता है जब हम अपने राष्ट्र या समाज के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करते हैं।

किसी को अगर हम प्रेरित करते हैं तो वीर पुरुष, धीर पुरुष व बुद्धिजीवी व्यक्तियों का उदाहरण देते हैं हमारा जीवन ऐसा होना चाहिए कि हम भी किसी मिसाल की तरह लोगों के सामने पेश हों। यदि किसी  सभा या महफिल में महान व्यक्तित्व के नामों का जयघोष लगाया जाए तो अंतिम में ही सही लेकिन हमारा नाम आना चाहिए। हस्ती हमारी कुछ ऐसी होनी चाहिए।

फिर नियति तुम्हारी कथा लिखेगी,
फिर नियति तुम्हारी गाथा लिखेगी।
तुम्हारी रण की नई गीता लिखेगी,
तुम्हें नये निर्माण का पिता लिखेगी।
तुम्हारा कोई पर्याय नहीं,
तुम्हारा कोई उपाय नहीं।
रोक सके जो राह तुम्हारा
ऐसा कोई निकाय नहीं।
कर दे सर फक्र से ऊंचा,
ऐसा अडिग स्वाभिमान बना।
अपनी अलग पहचान बना।
अपनी अलग पहचान बना।

Hindi poetry: apni alag pahchan bana के अंतिम अंश में कहा गया है कि अगर मैं अपने कदमों के निशान छोड़ गया तो एक दिन ऐसा अवश्य होगा कि नियति मेरी कथा और गाथा लिखीगी।
जो युद्ध मैं अपने अस्तित्व और भविष्य के निर्माण के लिए लड़ रहे होंगे नियति उस पर भी एक गीता लिखेगी जिसमें अर्जुन की भूमिका में मैं रहूंगा। अपनी आंतरिक शक्तियों का हम अवलोकन करें तो हमें पता चलता है कि मेरा कोई विकल्प नहीं है हमारे द्वारा किए गए कर्तव्य का कोई तोड़ नहीं है।
दुनिया में कोई ऐसा इकाई नहीं है जो हमारे बढ़ते कदम को रोक सके। हमारा स्वाभिमान इतना  अडिग होना चाहिए कि पूरे वंश का सर फक्र से ऊंचा कर दे। 

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